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रविवार, 18 जून 2017

फालतूपन (Redundancy by Purwa Bharadwaj)


रोजाना लगभग 50 किलोमीटर का सफ़र तय करते समय मेरा पसंदीदा काम है अपने दोस्तों को sms करना और उसके जरिए तार जोड़े रखना. चूँकि राह चलते शोर काफी रहता है, इसलिए फोन पर प्रायः बात नहीं करती हूँ. sms को बेहतर पाती हूँ कि अपनी कह दो और दूसरे को तत्काल परेशान भी न होना पड़े. हालाँकि उसमें भी तुरत जवाब पाने की उम्मीद रहती है और उत्साह बढ़ जाता है जब लगातार कुछ देर तक आदान-प्रदान चलता रहता है.



ऐसे ही मैं अपनी दोस्त से बातचीत में मशगूल थी. उसने मुझे चंद रोज़ पहले कान की बालियाँ तोहफे में दी थीं. मैंने sms लिखा कि आज बालियाँ पहन ली हैं और तुम्हें याद किया .उसका पलट कर तुरत जवाब आया कि आपकी ज़र्रानवाज़ी है. मेरा ध्यान पहले ज़र्रानवाज़ी शब्द पर गया कि कितने दिन बाद यह सुना है. फिर सोचा कि ऐसा क्यों है ? लगा कि दरअसल ऐसे मौके कम मिलते हैं या ऐसे रिश्ते कम है कि इस तरह के शब्दों को इस्तेमाल करने का मौक़ा मिले. रिश्तों की कमी, मौकों की कमी से शब्दों की कमी का सीधा सम्बन्ध नज़र आया .ऐसे में सोचा कि सबकी प्रचुरता हो तभी शब्द लौटेंगे और बात भी चलेगी. इस प्रचुरता का मतलब है फालतूपन की गुंजाइश रहना. यदि यह बचा रहे तो बातों में रौनक रहेगी.

ज़िन्दगी में थोड़ा फालतूपन रहना ज़रूरी है. बातों में, संबंधों में, हँसी में - सब जगह कुछ ऐसा हो जो किसी मकसद से न जुड़ा हो, बल्कि यों ही हो. आजकल यह एकदम गायब होता जा रहा है. सबकुछ नपा-तुला और ज़रूरत के मुताबिक होता है. हम तयशुदा रास्ते से , सवारी से आते-जाते हैं. कभी भटकना पड़े तो लगता है कि समय बर्बाद हो गया. आखिर ऐसा क्यों है? क्या हम सबको समय की वाकई कमी हो गयी है

मुझे लगता है कि समय तो उतना ही है, मगर हमने उसके बारे में हद से ज़्यादा ही गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया है और इसलिए दिलो दिमाग पर दबाव बढ़ गया है. यदि फालतूपन-Redundancy को रहने दें तो शायद मन हल्का लगे. ऐसा पहले महसूस नहीं किया था, पर इधर फेसबुक पर नौजवानॉ, बच्चों और अपनी उम्र के लोगों की गपशप को देख रही थी तो लगा कि अधिकतर यों ही सी टिप्पणी होती है, कोई किसी की चुटकी लेता है तो कोई हवा में फिकरा छोड़ता है और फिर उसपर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चल पड़ता है. पहले तो यह मुझे समय की बर्बादी लगी, पूरी भाषा नकली लगी, फिर लगा कि थोड़ा फालतू बात इंसान न करे तो इंसान ही न रहे. कम से कम इससे लोग जुड़ते तो हैं. हालाँकि इस सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में ऐसा बहुत कुछ है जिसका विश्लेषण किया जाना ज़रूरी है और फिलहाल मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है, लेकिन इसके कारण  लोग फालतू बातें करने के लिए समय निकालते हैं. उनका अकेलापन इससे दूर होता है.

तो चलें कुछ फालतू की बातें (जिसे मेरी बेटी हमेशा बेफालतू कहा करती है और उसपर मैं उसे कभी चिढ़ाती हूँ तो कभी उसे दुरुस्त करती हूँ) अब बंद करती हूँ. कई अहम काम इंतज़ार कर रहे हैं. उनमें मुब्तला होना समय की माँग है.


---- 11 अगस्त, 2007 को लिखी यह फालतू और अधूरी सी बात अभी मिली जब मेरे पास थोड़ा फालतू समय था और मैं अपने मेलबॉक्स से कुछ फालतू मेल को कचरे के डब्बे में डाल रही थी. जैसे इसे बचा लिया वैसे ही काफी कुछ फालतूपन बचा लेना चाहिए.

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